सत्यनारायण व्रत कथा, महत्त्व, आवश्यक सामग्री | Satyanarayan Vrat Katha

सत्यनारायण व्रत कथा अर्थात् सत्य को नारायण के रूप में पूजना। इसका यह अर्थ निकलता है कि इस पूरे संसार में सिर्फ प्रभु नारायण ही सत्य है बाकी सब मोह माया है।

यह पूजा हिंदू धर्म के लोग अक्सर किया करते हैं। इस कथा के माध्यम से मनुष्य को यह समझाया जाता है कि सत्य का पालन करना कितना महत्वपूर्ण होता है और ऐसा न करने पर क्या क्या परेशानियां आ सकती हैं।

इस कथा में ऐसी बहुत सारी छोटी छोटी कहानियां होती है जो यह दर्शाती हैं कि जब सत्य का पालन ना हो तो क्या होता है।

सत्यनारायण व्रत कथा का महत्त्व

ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति यह व्रत कथा करता है उसकी हर कामना पूर्ण होती है। कथा करने वाले को सत्य का पाठ समझ में आ जाता है।

हिंदू पुराणों और शास्त्रों में तो यह भी लिखा गया है कि जो भी इस पूजा को पूर्णिमा या एकादशी के दिन करता है उसे हजारों सालों तक किए गए यज्ञ के बराबर पुण्य मिलता है।

सुख समृद्धि मिलने के साथ-साथ दुख और दर्द का भी नाश होता है। सिर्फ इस कथा को सुनने मात्र से भी बहुत लाभ होता है। लोग पुत्र प्राप्ति, धन प्राप्ति, ग्रह शांति, रोजगार प्राप्ति, आदि इच्छाओं के लिए यह पूजा करते हैं।

सत्यनारायण व्रत कथा कैसे और कब की जाती है ?

यह पूजा पूर्णिमा या सक्रांति के दिन की जाती है। अगर आप कोई शुभ कार्य शुरू होने से पहले या किसी परेशानी को दूर करने के लिए पूजा कराना चाहते हैं तो मंगलवार का दिन भी उचित होगा।

यह पूजा स्नान करके, स्वच्छ कपड़े पहन कर करनी चाहिए। इस कथा का मुहूर्त भी तय होता है। हालांकि शाम को यह पूजा करना ही ज्यादा उचित रहता है परंतु कुछ लोग इसे सुबह भी करते हैं।

पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके यह कथा की जाती है। कथा शुरू करने से पहले आप गणेश जी की भी पूजा कर सकते हैं ताकि पूजा करते वक्त कोई भूल चूक ना हो जाए।

ऐसा माना जाता है कि गणेश जी पूजा में आने वाली अड़चनों का नाश करते हैं। कुछ लोग कथा शुरू करने से पहले सूर्य मंडल के नवग्रहों की भी पूजा करते हैं। साथ ही में नवधान्य भी बनाया जाता है। नवधान्य 9 प्रकार के अनाज के मिश्रण से बनता है। यह नो अनाज ब्रह्मांड के 9 ग्रहों का प्रतीक है।

यह पूजा बड़ों से लेकर बच्चों तक ,ब्राह्मणों से लेकर भिक्षुओं तक कोई भी कर सकता है। भक्ति ही एकमात्र योग्यता है जो आपको यह पूजा करने के लिए चाहिए। भक्तों को फल की इच्छा किए बिना इस पूजा को करना चाहिए।

सत्यनारायण व्रत कथा आवश्यक सामग्री

कथा के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है :-

  1. पंचामृत – कच्चे दूध ,दही, शक्कर, घी और शहद का मिश्रण । (तुलसी की पत्तियों के साथ )
  2. पंजीरी का प्रसाद (स्वयं इसे बनाएं )
  3. केले के पत्ते (भगवान की मूर्ति के चारों तरफ इसे बिछा दें)
  4. सत्यनारायण की मूर्ति (पवित्र पीला वस्त्र बिछाकर मूर्ति को स्थापित करें )
  5. पुष्प (चाहे तो नारायण का पसंदीदा पुष्प गुलाब अर्पित करें )
  6. सुपारी
  7. कुमकुम

पवित्रीकरण है आवश्यक

कथा शुरू होने से पूर्व स्वयं को और पूजा स्थान को पवित्र करना ना भूलें। बाएं हाथ से गंगाजल लेकर पहले खुद पर और बाद में पूजा स्थान पर छिड़के, साथ ही में पवित्रीकरण मंत्र भी बोलें।

सत्यनारायण व्रत कथा

एक बार काशी नामक छोटे से गांव में एक बहुत गरीब आदमी रहता था । भूखा-प्यासा वह यहां-वहां भूलोक में भटकता रहता था।

भगवान विष्णु से उसका यह दुःख देखा नहीं गया। उन्होंने एक वृद्ध आदमी का रूप-धारण किया और उसकी मदद करने पृथ्वीलोक आ गए। उन्होंने उस आदमी से पूछा – “तुम यहां-वहां क्यों घूम रहे हो? तुम इतने परेशान क्यों हो? मुझे सब जानना है” इस पर उसने जवाब दिया – ” मैं बहुत दरिद्र व्यक्ति हूं, इसीलिए भिक्षा के लिए इस पृथ्वी पर भ्रमण कर रहा हूं । अगर आपको कोई और मार्ग पता हो तो मुझे भी बताएं”

वृद्ध व्यक्ति बोला कि “तुम्हें सत्यनारायण भगवान विष्णु का व्रत करना चाहिए। ऐसा करके तुम्हें इन सभी तकलीफों से मुक्ति मिल जाएगी, तुम्हारे सारे पाप धुल जाएंगे और सारे दुखों का नाश होगा” यह उपाय बताकर वह वृद्ध गायब हो गया। वह गरीब आदमी पूरी रात इस व्रत के बारे में ही सोचता रहा और संकल्प बना लिया कि मैं यह व्रत जरूर करूंगा।

अगले दिन भी वह पूरे समय यही सोचता रहा और अपना कार्य करने निकल पड़ा। आज उसे भिक्षा में बहुत धन की प्राप्ति हुई और अपने संकल्प को पूरा कर उसने यह व्रत भी कर लिया। धीरे-धीरे उसके सभी दुःख और परेशानियां खत्म होती चली गई और धन-धान्य की भी वृद्धि होने लगी। वह सत्यनारायण व्रत कथा को हर महीने नियम से किया करता था। इसी वजह से उसके सब पाप मानो धूलते चले गए और मोक्ष प्राप्ति के पथ पर वह अग्रसर हो गया।

क्या सत्य पीर ही सत्यनारायण  हैं

बंगाल के इस्लामिक धर्म के लोग सत्य पीर नामक पूजा किया करते थे। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि सत्यनारायण पूजा ही पहले सत्य पीर थी। हालांकि इस्लामिक धर्म और हिंदू धर्म के लोग ऐसा बिल्कुल नहीं मानते परंतु ऐसा कहा जाता है कि यह दोनों पूजा एक ही हैं।

कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि इस्लामी युग में ब्राह्मणों ने नारायण को पीर नाम दे दिया , ताकि इस्लामिक धर्म के लोग इसे अपना भगवान समझकर पूजने लगे। ब्राह्मणों ने ऐसा हिंदू धर्म को इस्लामी युग में बढ़ावा देने के लिए किया था। उनकी यह तरकीब काम कर गई और बंगाल के मुस्लिमों के साथ-साथ बांग्लादेश के बौद्ध भी सत्य पीर की पूजा करने लगे।

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