रणकपुर जैन मंदिर : एक अध्भुत मंदिर

रणकपुर जैन मंदिर तीर्थंकर आदिनाथ के लिए बनाया गया एक मंदिर हैं । इसके निर्माण कि शुरुआत 1446 में हुई थी। यह काम 50 वर्ष से भी ज्यादा समय तक चला था जिसमें 99 लाख से भी अधिक कि धन राशि खर्च हो गई ।

यह पाली जिले के सादड़ी गाँव में मघाई नदी के किनारे स्थित हैं। सफेद संगमरमर का बनाया गया यह मंदिर अरावली पर्वतों के जंगलों के बीच में होने के कारण और भी सुंदर प्रतीत होता हैं।

इसकी गणना भारत के 5 सबसे पवित्र जैन मंदिरों में की जाती हैं जिसमें माउंट आबू का दिलवाड़ा मंदिर, गुजरात का पलिताना मंदिर, मध्य प्रदेश का खजुराहो मंदिर और कर्नाटक का गोमतेश्वर मंदिर भी शामिल हैं । जैन धर्म में इन 5 मंदिरों का बहुत मोल हैं। अगर किसी ने एक जीवन में इन पांचों मंदिरों के दर्शन कर लिए , समझो स्वर्ग प्राप्ति हो गई ।

यह जगह राजस्थान आने वाले पर्यटकों को और भी आकर्षित इसलिए करती है क्योंकि यह उदयपुर और जोधपुर से बिल्कुल समान दूरी पर हैं , ठीक दोनों के बीच में । इस कारण से इधर पहुँचना और भी ज्यादा सुविधाजनक हो जाता है ।

मंदिर कि प्रसिद्ध वास्तुकला

यह मंदिर अपनी वास्तुकला और नक्काशी के लिए बहुत प्रसिद्ध है । इस मंदिर में कुल 1444 स्तम्भ है परंतु किसी भी 2 स्तंभों की डिज़ाइन एक जैसी नहीं है। देवी-देवताओं, किन्नरों, नृत्य करने वाली अप्सराओं, यक्षों और यक्षियों से अलंकृत यह स्तंभ अद्भुत है । बेले, फूलों, कलियों, पत्तियों और सुंदर डिजाइनों के अलावा, प्रत्येक स्तंभ के पर स्थानीय जीवों का पूरा चित्र लिपटा हुआ है।

यह पूरा तीन मंजिला मंदिर सफेद संगमरमर (अंबर) से 15 वीं सदी में बनाया गया था, जिस कारण से यह राजस्थान कि तपती गर्मी में भी अंदर से शीतल रहता हैं ।

इस मंदिर का निर्माण इस प्रकार से किया गया है कि इसे किसी कृत्रिम रोशनी कि जरूरत ही नहीं हैं , केवल सूर्य का उजाला ही काफी हैं । पूरे दिन में इस सफेद संगमरमर में अलग अलग रंग दिखाई देते है और इस मंदिर की सुंदरता पर चार चाँद लग जाते हैं।

यह मंदिर एक ही संगमरमर के टुकड़े से बनी पार्श्वनाथ कि मूर्ति के लिए प्रसिद्ध हैं । मूर्ति में 1008 सांप के सिर और पूछें है । पार्श्वनाथ कि मूर्ति को शुद्ध करने के लिए 2 हाथी भी हैं।

मंदिर के परिसर में 4 कक्षाएं, 4 पूजा स्थल और 76 गुंबद वाले स्थान है । यह सब कुल मिलाकर हुए 84, जो की शुभ माना जाता है।

क्यों कहते है इसे चतुर्मुख मंदिर

इस मंदिर में कुल चार प्रवेश द्वार है और चारों द्वारो में आदिनाथ कि संगमरमर से बनाई करीब 72 ऊंची चार मूर्तियां है जिनका मुख चारों दिशाओं में है । इसलिए इसे चतुर्मुख कहा जाता है ।

मंदिर के निर्माताओं कि दूरदर्शिता

वैसे तो इतनी अनोखी और सुंदर नक्काशी और वास्तुकला से मंदिर के निर्माताओं कि खूबी और प्रतिभा का अनुमान लगाना ज़रा भी मुश्किल नहीं है ।

परंतु तहखाने बना कर उन्होंने अपनी दूरदर्शिता को भी साबित कर दिया। भविष्य में अगर कोई संकट आता है तो मंदिर कि पवित्र मूर्तियों को सुरक्षित रखने के लिए इन तहखानों का निर्माण किया था ।

मंदिर का इतिहास और रणकपुर गाँव कि स्थापना

एक धरन शाह पोरवाल नामक जैन व्यापारी ने इस मंदिर के निर्माण का स्वप्न पहली बार देखा था । 15 वी शताब्दी में एक दिव्य दृष्टि के बाद उन्होंने ठान लिया था कि वह इस मंदिर का निर्माण अवश्य करवाएंगे। सबसे पहले उन्होंने राजा राणा कुम्भा से इसके भव्य निर्माण के लिए जमीन मांगी और राजा ने उन्हें पूरे 48000 वर्ग फुट तक फेली हुई ज़मीन दी।

परंतु असली मुश्किल तो तब हुई जब धरन शाह को अपने स्वप्न जैसे मंदिर बनाने के लिए ठीक वास्तुकार मिल ही नहीं रहा था । वैसे तो उनके पास कई वास्तुकार अपना “डिजाइन सैंपल लेकर आए थे परंतु कोई भी उनके स्वप्न जैसा नहीं था ।

आखिर में जाकर उन्हें एक मामूली वास्तुकार दीपक (जो कि मंडारा से था) , उसका काम पसंद आया और उन्होंने यह शुभ कार्य जल्द ही शुरू करवाया ।

परंतु राजा राणा कि एक शर्त थी कि धरन शाह को इस मंदिर के आस पास एक गाँव (कस्बा) भी स्तथापित करना होगा जिसका नाम राजा के नाम पर रखा जाए । और ऐसा हुआ भी , यह गाँव अब रणकपुर के नाम से जाना जाता है। (जो पहले रणपुर के नाम से भी जाना जाता था)

इस कार्य में कुल 2785 कर्मियों की जरूरत पड़ी और यह काम 1389 से 1496 तक चला।

यह जैन मंदिर कभी–कभी “धरन विहार” के नाम से भी जाना जाता है ।

मुगलों का हमला

ऐसा माना जाता है कि जब मुगलों ने राज्य पर विजय प्राप्त कर के इस अद्भुत महल-रूपी मंदिर को हासिल किया था तब तक यह और भी सुंदर हुआ करता था परंतु फिर इसकी हालत बहुत बुरी हो गई थी।

परंतु कुछ ही सालों बाद इसका पुनः अन्वेषण किया गया और इसको एक पर्यटक स्थल में बदल दिया गया ।

एक अधूरे स्थम्ब का राज़

वैसे तो इस मंदिर में 1444 स्तंभ, 89 गुंबद, 426 कॉलम और 29 हॉल हैं। परंतु फिर भी एक स्तंभ है जो कि अधूरा है या यूं कह लो कि खण्डित है। और जितनी भी बार इनको सही करने की कोशिश की गई है, अगले ही दिन यह फिर से टूट जाया करता है। ऐसी मान्यता है कि एक स्तंभ का यूं अधूरा रहना ही अनिवार्य है ।

रणकपुर जंगल सफारी

अभी हाल ही में इसके निर्माण के कारण रणकपुर में पर्यटकों का आना जाना बड़ गया है । यहाँ तेंदुओं को देखने की संभावना बहुत ही ज्यादा है । यह जगह रणकपुर जैन मंदिर से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर है । यहाँ के स्थानीय लोग ही सरकार के इस प्रकृति के बचाव में सहायक बने है । उन्हें जंगलों कि और वहां रहने वाले जीव–जंतुओं की अच्छी जानकारी है ।

इस जानकारी को वह पर्यटकों को शेर और तेंदुए दिखाने में इस्तेमाल करते है ।

रणकपुर जैन मंदिर के आस पास के मंदिर

नेमीनाथ मंदिर, पारसनाथ मंदिर, सूर्य मंदिर और अम्बा माता मंदिर जैसे बहुत से मंदिर रणकपुर जैन मंदिर के आस–पास है। एक भक्त के लिए रणकपुर किसी स्वर्ग से कम नहीं है। आत्मा कि तृप्ति और मन कि शांति के लिए इससे बेहतर जगह हो ही नही सकती है।

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