महाराणा प्रताप जयंती कब और क्यों मनाई जाता है | Maharana Pratap Jayanti

नमस्कार साथियों!!

भारत देश, एक ऐसा देश है जिसका अपना ही एक स्वर्णिम एवं व्यापक इतिहास है। भारत की भूमि पर जन्म लेने वाले लोगों को खुद को गौरवान्वित महसूस करना चाहिये कि उन्होनें भारत की मिट्टी में जन्म लिया है। वहीं भारत की मिट्टी, जिसने कई बुद्धिजीवियों जैसे:- आर्यभट्ट, चाणक्य, अष्टावक्र , तुलसीदास, कबीरदास आदि को इस विश्व को दिया। यही नहीं इस मिट्टी मे कई वीर सपूतों ने भी जन्म लिया जिन्होनें अपना नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा दिया। जैसे:- छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप जी, पृथ्वीराज चौहान, चंद्रगुप्त मौर्य आदि।

आज हम ऐसे ही एक वीर सपूत की बात इस लेख में करने वाले हैं जिसने न सिर्फ भारत वरन विश्व स्तर पर अपनी एक अनोखी छाप छोड़ी। जिसकी जयंती को प्रत्येक वर्ष जोश के साथ मनाया जाता है।

लंबी थी कद-काठी जिसकी, सीना जिसका चौड़ा था

नमन है उस महाराणा को, चेतक जिसका घोड़ा था

राजस्थान की माटी (मिट्टी) का वीर सपूत और मेवाड़ की शान थे जो उन्हीं वीर महाराणा प्रताप की बात हम यहाँ करेंगे। महाराणा प्रताप की जयंती हर वर्ष 9 मई को मनाई जाती है। महाराणा प्रताप जिन्हें बचपन में ‘कीका’ कहकर भी बुलाया जाता था, उनसे संबंधित कई ऐसे विशेष तथ्य हैं जो आम जन मानस को हैरान कर देते हैं। महाराणा प्रताप की जयंती पर उनके वीरता से भरपूर जीवन को याद किया जाता है तथा उनके व्यक्तित्व को स्मरण करते हुए उन्हें सौहार्दपूर्ण श्रद्धांजली दी जाती है।

महाराणा प्रताप का इतिहास

महाराणा प्रताप के जन्म को लेकर विद्वानों ने अपने अलग-अलग मत दिए हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि महाराणा प्रताप का जन्म राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ था क्योंकि उनके पिताजी वहीं शासन करते थे। वहीं कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि महाराणा प्रताप का जन्म पाली में हुआ था क्योंकि उनकी माँ पाली की ही रहने वाली थीं और मान्यता के अनुसार उस समय पहला बच्चा पीहर (मायके) में होता था। खैर! बहुमत की माने तो महाराणा प्रताप का जन्म स्थल कुंभलगढ़ को ही माना जाता है।

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। इसलिये हर वर्ष 9 मई को महाराणा प्रताप की जयंती को रूप में मनाया जाता है। महाराणा प्रताप के पिताजी महाराज उदय सिंह और माताजी जयवंता बाई थीं।

महाराणा प्रताप ने अपने बचपन का अधिकांश समय भील समुदाय के साथ बिताया था। उन्हीं के साथ उन्होनें शस्त्र कला व युद्ध कला सीखी थी। भील समुदाय में प्रशिक्षणार्थियों को ‘कीका’ कहकर बुलाया जाता था। इसलिए महाराणा प्रताप जी को भी बचपन में कीका कहकर संबोधित किया जाता था। महाराणा प्रताप का एक पसंदीदा अश्व (घोड़ा) था जिसका नाम चेतक था। महाराणा और चेतक की जोड़ी के ऊपर साहित्यकारों ने कई काव्य व कहानियों की रचना की है। चेतक के बारे में कहा जाता है कि वह हवा से बातें करता था यानि बहुत तेज दौडता था।

हल्दीघाटी का युद्ध

महाराणा प्रताप की जब भी बात की जाती है तो हल्दीघाटी के युद्ध का ज़िक्र होना लाज़मी  है। हल्दीघाटी का युद्ध सन् 1576 में मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप की सेना के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध के बारे में भी साहित्य में विविधता देखने को मिलती है। कहीं से पता चलता है कि ये युद्ध महाराणा की सेना के 2000 और मुगलों की सेना के 10,000 सैनिकों के बीच लड़ा गया था। वहीं अन्य जानकारी के मुताबिक ये युद्ध महाराणा की सेना के 10,000 और मुगलों की सेना के एक लाख सैनिकों के मध्य लड़ा गया था। इसमें कोई स्पष्टता नहीं है लेकिन इतना साफ़ है कि मुगल सेना ज्यादा थी। इस युद्ध को काफ़ी भयानक माना जाता है क्योंकि इस युद्ध में एक ही दिन में कई सैनिक मारे गए थे। कहा जाता है कि इस युद्ध में महाराणा का प्रिय घोड़ा चेतक भी वीरगति को प्राप्त हो गया था। संख्या में कम होने के बावजूद महाराणा की सेना मुगल सेना पर भारी पड़ रही थी। एक समय ऐसा आया जब महाराणा काफ़ी घायल हो गए थे। मुगल सेना के सामने समर्पण करना उनके लिए गवारा न था। इसलिए कहा जाता है कि वो वहां से बच निकले। अकबर की लाख कोशिशों के बावजूद भी मुगल सेना महाराणा को पकड़ नहीं पाई। बाद में महाराणा ने छापेमार युद्ध नीति का प्रयोग करते हुए अपने क्षेत्र पर पुनः नियन्त्रण स्थापित कर लिया था।

महाराणा प्रताप के बारे में विशेष तथ्य

  • कहा जाता है कि महाराणा प्रताप युद्ध में लगभग 72 किलो का कवच पहन कर जाते थे।
  • उनका कद 7 फुट से ज्यादा था।
  • ये भी कहा जाता है कि उनकी दोनों तलवारों का कुल वजन लगभग 208 किलोग्राम था।
  • उनकी 11 पत्नियों के साथ कुल 17 बच्चे थे।

महाराणा प्रताप की जयंती और सीख

महाराणा प्रताप की जयंती पर हम उनके जीवन से कई सीखें ले सकते हैं, जैसे:-

  •  देशभक्ति की भावना:- अकबर की लाख कोशिशों के बावजूद भी महाराणा ने अकबर से संधि नहीं की और युद्ध के लिए तैयार रहे। अपने देश के प्रति उनका असीम प्रेम था।
  • पशु प्रेम:- महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक उनका बहुत प्रिय था। वो उसे साथी की तरह ही मानते थे। उनके बीच एक मजबूत रिश्ता था।
  • साहस :- कहते हैं कि जान बाजुओं में नहीं बल्कि इरादों में होनी चाहिए। बात करें महाराणा प्रताप की तो उनके बाजुओं के साथ-साथ उनके इरादों में भी जान थी। वे एक साहसी योद्धा थे।

यहाँ हमनें कुछ ही सीखों की बात की है, इसके अलावा भी कई ऐसी चीजें हैं जो हम उनके व्यक्तित्व से सीख सकते हैं।

निष्कर्ष

हमनें अभी तक बात की कि महाराणा प्रताप को बचपन में कीका कहकर संबोधित किया जाता था। हमनें हल्दीघाटी के विशेष युद्ध की भी बात की। महान व्यक्तियों की जयंतियां एक अवसर होता है जिस पर हम उन व्यक्तियों के बारे में जानें और उनसे कुछ सीख लेने की कोशिश करें।

महाराणा प्रताप जयंती एक अवसर है भारत देश के उस वीर सपूत को याद करने का और खुद को गौरवान्वित महसूस करने का।

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