जोधपुर में घूमने की जगह | Places to Visit in Jodhpur

जोधपुर जिसे राजस्थान की ब्लू सिटी” भी कहा जाता है , यह राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। यहाँ अधिकतर मकानों का रंग नीला होने के कारण इसे ब्लू सिटी कहा जाता है। जो लोग राजस्थान का इतिहास और राजपूतों के रहन-सहन को जानने में रुचि रखते हैं उनके लिए जोधपुर से बेहतर स्थान नहीं हो सकता हैं।

यह शहर समृद्ध संस्कृति, सम्मोहक इतिहास एवं सुंदर वनस्पति से भरा हुआ है। यहाँ के क़िले, झीलें, भवन, महल, उद्यान आदि विश्व प्रसिद्ध है। इसीलिए इसे राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी का पद मिला है।

1459 ई. में इसकी स्थापना राजा राव जोधा ने की थी। उन्हीं के नाम पर जोधपुर को अपना नाम भी मिला । 500 से अधिक वर्षों तक जोधा के वंशजों ने जोधपुर पर राज किया।

जोधपुर को “सूर्य नगरी” भी कहा जाता है क्योंकि राजस्थान के बिल्कुल मध्य में स्थित होने के कारण सूर्य का ताप यहाँ पर सबसे ज्यादा रहता है। जोधपुर थार रेगिस्तान के भी बहुत समीप है।

2014 की “वर्ल्डस मोस्ट एक्स्ट्राऑर्डिनरी प्लेसिस” की लिस्ट में जोधपुर प्रथम स्थान पर था।

जोधपुर में घूमने की जगह

  • मेहरानगढ़ क़िला

यह क़िला जोधपुर की पहचान माना जाता है। यह भारत का सबसे बड़ा क़िला हैं। 500 साल पहले इसका निर्माण राव जोधा ने 1459 में करवाया था। 410 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस क़िले में कई सारी घूमने लायक जगह है जैसे कि फूल महल, मोती महल, म्यूजियम, चामुंडा देवी मंदिर, शीश महल आदि।

म्यूजियम के अंदर पुराने जमाने के हथियार जैसे की तलवारे, पुराने संगीत वाद्य यंत्र, राजपूती पोशाके, पेंटिंग्स, पालकी आदि सामान को संगठित करके पर्यटकों के अवलोकन के लिए रखा गया है। इस महल में कुल 7 द्वार है जो विभिन्न राजाओं ने अपनी हर विजय को अविस्मरणीय बनाने के लिए बनवाए थे जैसे कि लोहा द्वार, फतेह द्वार, विजय द्वार आदि।

इस क़िले में आज भी राजस्थानी उत्सव जैसे कि राजस्थान का लोक महोत्सव, दशहरा और गणगौर बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। पूरे क़िले को बिल्कुल दुल्हन की तरह सजाया जाता है। बहुत से लोग यहाँ एकत्रित होकर इस क़िले की सुंदरता पर चार चाँद लगा देते हैं।

  • उम्मेद भवन पैलेस (चित्तर पैलेस)

इसका निर्माण महाराजा उम्मेद सिंह द्वारा 1929-43 में करवाया गया था। वास्तुकार हेंनरी वॉन लानचेस्टर को इस कार्य के लिए चुना गया।

इस कार्य में इतना अधिक समय इसलिए लगा क्योंकि इस महल का निर्माण राजा ने अपने लिए नहीं बल्कि अपनी प्रजा के लिए करवाया था। जोधपुर और आसपास के इलाकों में अचानक सूखा पड़ने के कारण किसानों और निम्न वर्ग के मजदूरों को काम मिलना मुश्किल हो रहा था। रोजगार बढ़ाने के लिए राजा ने इस महल को बनाने का आदेश जा़री किया। यही कारण था कि इस कार्य में इतने वर्ष लगे।

बलुआ पत्थर से बना हुआ यह पैलेस अपनी वास्तुकला और डिज़ाइन के लिए विश्व-प्रसिद्ध है। इस पैलेस से बहुत सारी दिलचस्प ऐतिहासिक और पौराणिक कहानियाँ जुड़ी हुई है।

इस पैलेस के तीन भाग है :-

  1. एक भाग शाही खानदान का है जहाँ सामान्य पर्यटक को आने की अनुमति नहीं है। राजा उम्मेद सिंह के पौत्र महाराजा गज सिंह इस पैलेस के मालिक हैं।
  2. एक भाग को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है और यहाँ राजपूतों के पूर्वजों के हथियार, पोशाके, आदि सामान एकत्रित है।
  3. बाकी भाग को “ताज होटल ग्रुप” को दे दिया गया है। इस महल में कुल 347 कमरे हैं। यह कमरे बहुत ही आलीशान और भव्य है। इस पैलेस की गिनती भारत के कुछ सबसे आलीशान होटलों में की जाती है।
  • मंडोर गार्डन

मंडोर मारवाड़ की प्राचीन राजधानी हुआ करता था। जोधपुर से लगभग 8 किलोमीटर दूर मंडोर में ही इस गार्डन को बनाया गया है।

ऐसा माना जाता है कि हिंदुओं में 30 करोड़ से भी अधिक देवी-देवताओं को पूजा जाता है परंतु चकित करने वाली बात तो यह है कि इस गार्डन में 30 करोड़ देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित है। इससे ज़्यादा अविश्वसनीय बात और क्या हो सकती है?

यह गार्डन बहुत ही विशाल है और यहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के महल है जैसे कि जनाना महल, खंभा महल, अजीत पोल इत्यादि। इसके अलावा झील, बावड़ी, नहर, संग्रहालय आदि का भी आनंद लिया जा सकता है।

इस संग्रहालय में खुदाई में मिली राजपूतों की पुरानी कलाकृतियाँ, औजा़र, पोशाके, इत्यादि अवशेषों को सहेज कर रखा गया है। यह संग्रहालय सरकार द्वारा संभाला जाता है।

इस गार्डन में राजपूत लोक सेनानियों को समर्पित “हॉल ऑफ हीरोज़” का भी निर्माण हुआ है। मंडोर गार्डन को मेहरानगढ़ क़िले का ही भाग माना जाता है।

  • बालसमंद झील

यह एक कृत्रिम झील है जिसका निर्माण‌ 1159 ई. में हुआ था। यह झील मंडोर रोड पर स्थित है जो जोधपुर से लगभग 5 किलोमीटर दूर है।

इस झील के बीचों-बीच एक बालसमंद लेक पैलेस भी है जहाँ पहले शाही परिवार गर्मियों में आया करता था। दरअसल झील के बिल्कुल मध्य में बना यह पैलेस राजस्थान की तपती गर्मी में भी बहुत ठंडा रहता है।

इस झील के आसपास के प्राकृतिक नजारें देख कर यह कह पाना बहुत मुश्किल होगा कि यह जगह राजस्थान में स्थित है। पर्यटक यहाँ पर नाव सवारी का भी आनंद ले सकते हैं।

  • विश्नोई गांव

यह गांव जोधपुर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अमृता देवी विश्नोई, उनकी कुर्बानी और उनके नाम पर आधारित पुरस्कार के बारे में किसने नहीं सुना होगा ?

विश्नोई जाति प्रकृति के साथ अपने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए जानी जाती है। अमृता देवी विश्नोई और 363 बिश्नोईयों ने सिर्फ खेजड़ी पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान गवाई थी। विश्नोई जाति खेजड़ी पेड़ों को पूजनीय मानते हैं। इसीलिए इस गांव में खेजड़ी पेड़ों की भरमार देखने को मिलती है।

इसके अतिरिक्त यहाँ बहुत से काले हिरण भी निवास करते हैं। पर्यटक यहाँ जंगल सफारी का भी आनंद ले सकते हैं।

इतने वर्षों से पर्यटक-स्थल होने के बाद भी इस गांव में कोई पक्का घर नहीं है। इसीलिए अगर कोई पर्यटक यहाँ रुकना चाहे तो उसे भी मिट्टी के घरों में ही रहना पड़ेगा। विश्नोई जाति के रहन-सहन और खान-पान को जानने के लिए और राजस्थान की संस्कृति को करीब से समझने के लिए इस गांव से बेहतर जगह नहीं हो सकती है।

भले ही यह गांव उतना विकसित नहीं है परंतु फिर भी प्रकृति को बिना हानि पहुँचाए शांतिपूर्ण निवास करना इन लोगों को बखूबी आता है। हमारी आधुनिक पीढ़ी को यह गुण इनसे अवश्य ही सीखना चाहिए।

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