निति आयोग- क्या, उद्देश्य, कार्य ? | NITI AAYOG in hindi

निति आयोग गठन

निति आयोग का गठन 1 जनवरी 2015 को हुआ था।

NITI AAYOG Full Form

NITI Stand for – “National Institute of Transforming India” or in Hindi – “राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान

निति आयोग के उद्देश्य

  • राज्यों की सक्रिय भागीदारी के साथ राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं व राजनीतियो का एक साझा दृश्टिकोण विकसित करना।
  • साहियोगपूर्ण संघवाद को बढ़ावा देना।
  • ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजनाए तैयार करने के लिए एक तंत्र विकसित करना।
  • आर्थिक कार्यनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा के हितो को शामिल करना।
  • समाज के उन वर्गों पर विशेष रूप से ध्यान देना, जिन पर आर्थिक प्रग्रति के लाभ पहुंच न पाए हो।
  • रणनीतिक और दीर्घकालिक कार्यक्रम का ढांचा तैयार करना।
  • कार्यक्रम तथा नीति के किर्यान्वन के लिए प्रोधोगिक उन्नयन और कौशल विकास पर बल देना।

नीति आयोग की स्थापना के कारण

1991 में नयी आर्थिक नीति के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में काफी परिवर्तन आया है। देश में आर्थिक , औधोगिक , सामाजिक जनसांख्यिकी संरचना में काफी बदलाव हुआ है।
अतः नियोजन हेतु योजना आयोग जैसी परंपरागत संस्था की तुलना में एक नयी संस्था की आवश्यकता है ,जिसे निम्न सन्दर्भों में समझा जा सकता है –

  1. आर्थिक परिवर्तन
  2. निजी क्षेत्र की भूमिका में परिवर्तन
  3. जनसांख्यिकी परिवर्तन
  4. राज्यों की भूमिका में परिवर्तन
  5. वैश्वीकरण की शक्ति
  6. नयी प्रौद्योगिकी

आर्थिक परिवर्तन
भारतीय अर्थव्यवस्था का जीडीपी रुपए 1000 करोड़ से बढ़कर 100 लाख करोड़ हो गया है। जीडीपी में कृषि का हिस्सा
56% से घटकर १६% हो गया। जबकि सेवा क्षेत्र का हिस्सा ५०% से अधिक हो गया है।
अतः प्राथमिकताएं एवं रणनीतियां जो योजना आयोग के समय से चली आ रही है अब बदलनी चाहिए।

निजी क्षेत्र की भूमिका में परिवर्तन
वर्त्तमान अर्थिकीकरण वैश्विक उदारीकरण में निजी क्षेत्र को अत्यंत सक्रिय व गतिशील भूमिका प्रदान करता
है। अब सरकार को केवल उत्प्रेरक की भूमिका निभानी चाहिए।
अतः नियोजन तंत्र व प्रक्रिया में परिवर्तन आवश्यक है।

जनसांख्यिकी परिवर्तन
वर्त्तमान में भारत की जनसँख्या 1.21 करोड़ हो गए है , जिसमे ५५ करोड़ युवा जनसँख्या है अर्थात प्राथमिक व विकास के बढ़ते स्तर के साथ लोगों की आकांक्षाएं ऊँची हो गए है। अतः भारत के नियोजन तंत्र को इन जरूरतों के अनुरूप बदलना होगा।

राज्यों की भूमिका में परिवर्तन
राज्यों के समुचित विकास के बिना देश को विकास संभव नहीं है। उनत राज्यों को राष्ट्रीय विकास में बराबर को हिस्सेदार बनाकर उनकी भूमिका को शक्तिसाली कर सहकारी संघवाद सिद्धांत पर चलने की आवश्यकता है।

वैश्वीकरण की शक्तिया
वर्तमान में दुनिया विश्व ग्राम के रूप में परिवर्तित हो गयी है। ऐसे वातावरण में हमारी अर्थव्यवस्ता भी घटनाओ से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। अतः सरकार को त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता है।

नयी प्रोधोगिकी
प्रोधोगिक प्रग्रति तथा सूचना प्रसार में भारत की सृजन शील ऊर्जा के लिए द्वार खोल दिए है। अतः यह आवश्यक है कि नयी प्रोधोगिकी को शासन प्रणाली व नियोजन में प्रयोग किया जाये।

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