माँ बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ – देवी शक्तिपीठ

डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ राज्य में राजनांदगांव जिले का एक शहर और नगर पालिका है तथा माँ बम्लेश्वरी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। डोगरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित शक्तिरूपा मां बम्लेश्वरी देवी का विख्यात मंदिर आस्था का केंद्र है।

बड़ी बम्लेश्वरी के समतल पर स्थित मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है।

बम्लेश्वरी मंदिर का विराट मेला

माँ बम्लेश्वरी के मंदिर में प्रति वर्ष नवरात्र के समय दो बार विराट मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें लाखों की संख्या में दर्शनार्थी भाग लेते हैं।

चारों ओर हरे भरे वनों पहाड़ियों छोटे बड़े तालाबों एवं पश्चिम में पनियाजोब जलाशय उत्तर में धारा जलाशय तथा दक्षिण में मड़ियाँ जलाशय से घिरा प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण स्थान है-डोंगरगढ़।

यहां पहाड़ी पर स्थित मंदिर पर जाने के लिए सीढ़ियों के अलावा रोपवे की सुविधा भी है। यहां यात्रियों की सुविधा हेतु पहाड़ों के ऊपर पेयजल की व्यवस्था, विद्युत प्रकाश, विश्रामालयों के अलावा भोजनालय व धार्मिक सामग्री खरीदने की सुविधा है। डोंगरगढ़ रायपुर से 100 किलोमीटर तथा नागपुर से 190 कि.मी. की दूरी पर स्थित है तथा “मुंबई-हावड़ा रेल मार्ग” के अंतर्गत आता है।

बम्लेश्वरी मंदिर में पर्यटकों के लिए आवास व्यवस्था

श्री बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट समिति, डोंगरगढ़ द्वारा संचालित धर्मशाला में पर्यटकों के आवास के लिए अच्छी व्यवस्था हो रखी है।

बम्लेश्वरी मंदिर पहुंचने के विभिन्न मार्ग

वायु मार्ग: रायपुर (100 कि.मी.) निकटतम हवाई अड्डा है जो मुंबई, दिल्ली, नागपुर, हैदराबाद, बैगलूरू, विशाखापट्नम एवं चैन्नई से जुड़ा हुआ है ।

रेल मार्ग: हावड़ा-मुंबई मुख्य रेल मार्ग पर डोंगरगढ़ रेलवे जंक्शन है।

बम्लेश्वरी मंदिर से जुड़ी विभिन्न ऐतिहासिक कहानियाँ

पुरानी मान्यता के अनुसार 2200 वर्ष पूर्व डोंगरगढ प्राचीन नाम “कामाख्या नगरी” में राजा वीरसेन का शासन था जो कि निःसंतान थे। पुत्र रत्न की कामना हेतु उसने महिषामती पुरी मे स्थित शिवजी और भगवती दुर्गा की उपासना की। जिसके फलस्वरूप रानी को एक वर्ष पश्चात पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

ज्योतिषियों ने नामकरण में पुत्र का नाम “मदनसेन” रखा। मान्यता है कि किसी वक्त में इस जगह को कामाख्या नगरी के नाम से पुकारा जाता था। उस वक्त के राजा मदनसेन के बेटे कामसेन ने एक नर्तकी कामकंदला और उसके साथी माधवानल को राजदरबार में खुश होकर अपने गले का हार दें दिया था।

माधवानल ने ये हार कामकंदला को पहना दिया। इससे गुस्सा होकर कामसेन ने माधवानल को देश से बाहर निकालने का आदेश दे दिया। इसके बाद माधवानल कामकंदला को मुक्त कराने की अपील लेकर राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे। इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने कामाख्या  नगरी पर हमला बोल दिया और राज्य पर जीत भी हासिल कर ली।

लेकिन इस दौरान कामकंदला को किसी ने माधवानल के युद्ध में मारे जाने की झूठी खबर दे दी। जिसके बाद कामकंदला ने तालाब में कूदकर जान दे दी। दुःख में माधवानल ने भी जान दे दी। इस बात से राजा विक्रमादित्य परेशान हो गए और मां बगलामुखी की आराधना शुरू कर दी। मां ने खुश होकर दर्शन दिए और दोनों को जीवनदान दिया।

जिसके बाद से यहां मां बम्लेश्वरी के तौर पर आज तक पूजी जाती हैं। अगर आप भी यहां दर्शन करना चाहते हैं तो आपको रायपुर एयरपोर्ट पहुंचकर सिर्फ 70 किलोमीटर का सफर करना होगा। इसके अलावा ये जगह रेलमार्ग से भी अच्छी तरह जुड़ा है।

मां बम्लेश्वरी मंदिर के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ

  • छोटी और बड़ी बम्लेश्वरी  माता का मंदिर :- एतिहासिक और धार्मिक नगरी डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी के दो मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैं। एक मंदिर1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है जो बड़ी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। समतल पर स्थित मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से विख्यात है।
    ऊपर विराजित मां और नीचे विराजित मां को एक दूसरे की बहन कहा जाता है। ऊपर वाली माँ बड़ी और नीचे वाली छोटी बहन मानी गई है।
  • एक ट्रस्ट पर चलता है यह मंदिर :- सन 1964 में खैरागढ़ रियासत के भूतपूर्व नरेश श्री राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने एक ट्रस्ट की स्थापना कर मंदिर का संचालन ट्रस्ट को सौंप दिया था।
  • माँ बम्लेश्वरी देवी शक्तिपीठ का इतिहास लगभग 2200 वर्ष पुराना है। डोंगरगढ़ से प्राप्त भग्रावेशों से प्राचीन कामावती नगरी होने के प्रमाण मिले हैं। पूर्व में डोंगरगढ़ ही वैभवशाली कामाख्या नगरी कहलाती थी।
  • माँ बम्लेश्वरी मंदिर के इतिहास को लेकर कोई स्पष्ट तथ्य तो मौजूद नहीं है, लेकिन मंदिर के इतिहास को लेकर जो पुस्तकें और दस्तावेज सामने आए हैं, उसके मुताबिक डोंगरगढ़ का इतिहास मध्यप्रदेश के “उज्जैन” से जुड़ा हुआ है।
  • माँ बम्लेश्वरी को मध्यप्रदेश के उज्जैयनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की कुल देवी भी कहा जाता है।
  • इस जगह से मिले हैं कई ऐतिहासिक प्रमाण :- इतिहासकारों और विद्वानों ने इस क्षेत्र को कल्चुरी काल का पाया है लेकिन अन्य उपलब्ध सामग्री जैसे जैन मूर्तियां यहां दो बार मिल चुकी हैं, तथा उससे हटकर कुछ मूर्तियों के गहने, उनके वस्त्र, आभूषण, मोटे होठों तथा मस्तक के लम्बे बालों की सूक्ष्म मीमांसा करने पर इस क्षेत्र की मूर्ति कला पर गोंड कला का प्रमाण परिलक्षित हुआ है।
  • आखिर क्यों पड़ा इस जगह का नाम डोंगरगढ़? :- यह अनुमान लगाया जाता है कि 16 वीं शताब्दी तक डूंगराख्या नगर गोंड राजाओं के अधिपत्य में रहा। यह अनुमान भी अप्रासंगिक नहीं है कि गोंड राजा पर्याप्त समर्थवान थे, जिससे राज्य में शांतिव्यवस्था स्थापित थी। आज भी पहाड़ी में किले के बने हुए अवशेष बाकी हैं। इसी वजह से इस स्थान का नाम डोंगरगढ़ (गोंगर, पहाड़, गढ़ किला) रखा गया और मां बम्लेश्वरी का मंदिर चोटी पर स्थापित किया गया ।
  • ऐतिहासिक और धार्मिक स्थली डोंगरगढ़ में कुल 1100 सीढियां चढ़ने के बाद माँ के दर्शन होते हैं ।
  • रोपवे की सुविधा:– यात्रियों की सुविधा के लिए रोपवे का निर्माण किया गया है। रोपवे सोमवार से शनिवार तक सुबह 8 से दोपहर २ और फिर दोपहर 3 से शाम 6:45 तक चालू रहता है। रविवार को सुबह 7 बजे से रात 7 बजे तक चालू रहता है। नवरात्रि के मौके पर 24 घंटे रोपवे की सुविधा रहती है।
  • पर्यटक बोटिंग का भी आनंद ले सकते हैं:- मंदिर के नीचे “छीरपानी जलाशय” है जहां यात्रियों के लिए बोटिंग की व्यवस्था भी है।
  • माँ बम्लेश्वरी के आस-पास घूमने के स्थान:- डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी के दो मंदिरों के अलावा बजरंगबली मंदिर, नाग वासुकी मंदिर, शीतला मंदिर, दादी मां मंदिर भी हैं।
  • माँ पातालभैरवी मंदिर:- मुंबई हावड़ा मार्ग पर राजनांदगांव से डोंगरगढ़ जाते समय राजनांदगांव में माँ पाताल भैरवी दस महाविद्या पीठ मंदिर है, जो दर्शनीय है। जानकार बताते हैं कि विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग के आकार के मंदिर में माँ पातालभैरवी विराजित हैं। तीन मंजिला इस मंदिर में पाताल में माँ पाताल भैरवी, प्रथम तल में दस महा विदयापीठ और ऊपरी तल पर भगवान शंकर का मंदिर है।

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