लोहड़ी का त्यौहार | Festival of Lohri

ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार लोहड़ी हर साल 13 जनवरी को मनाई जाती है। क्षेत्रीय कैलेंडर के अनुसार, लोहड़ी साल के सबसे ठंडे महीने पौष महीने के आखिरी दिन पड़ती है। प्राचीन काल में, लोहड़ी को शीतकालीन संक्रांति से पहले मनाया जाता था, जो वर्ष की सबसे लंबी रात होती है। आज, यह उत्तरायण की शुरुआत में मनाया जाता है वह समय जब सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ता है।

लोहड़ी त्यौहार के अगले दिन से माघ महीने की शुरुआत होती है और इस दिन को पंजाब में माघी कहा जाता है, इस दिन तमिलनाडु में पोंगल और देश के अधिकांश अन्य हिस्सों जैसे कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड में मकर संक्रांति मनाई जाती है।

लोहड़ी कौन मनाता है?

लोहड़ी मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू के कुछ हिस्सों में मनाई जाती है। हालाँकि, भारतीय एकता को प्रदर्शित करता यह त्यौहार पूरे देश में कई हिंदुओं और सिखों द्वारा मनाया जाता है, देश के कई हिस्सों में लोग अलाव जलाते है एवं नाचते गाते इस त्यौहार का आनंद लेते हैं।

लोहड़ी क्यों मनाते हैं?

फसल कटाई का समय विशेष रूप से कृषक समुदाय में खुशी और उत्साह लेकर आता है। गर्मी की मौसम के आरम्भ होने पर किसान सूर्य भगवान को धन्यवाद देने के लिए इकट्ठा होते हैं, जिसने उनकी लंबी महीनों की मेहनत का फल बेहतरीन फसल के रूप मे उन्हें प्रदान किया।

हम सभी किसानों के वर्ष भर के श्रमसाध्य प्रयासों के लिए ऋणी हैं, जिसके बिना हम न तो खा सकते हैं और न ही रह सकते हैं। लोहड़ी का त्यौहार किसानों के लिए भरपूर और समृद्ध फसल उत्सव के रूप में सम्मान और मान्यता का प्रतीक है।

पंजाब की मुख्य सर्दियों की फसल, गेहूं, अक्टूबर में बोई जाती है और खेतों में जनवरी में अपने चरम पर देखी जाती है, जबकि फसल की कटाई मार्च में की जाती है। लोग एक अलाव के आसपास इकट्ठा होते हैं और शीतकालीन संक्रांति के गुजरने और जनवरी में लोहड़ी के रूप में आने वाले वसंत के मौसम का जश्न मनाते हैं।

लोहड़ी के उत्सव से जुड़ा एक और विशेष महत्व यह है कि इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है जिसे शुभ माना जाता है क्योंकि यह एक नई शुरुआत का प्रतीक है।

लोहड़ी का समारोह

हर साल लोहड़ी का त्यौहार पारंपरिक अलाव के साथ मनाया जाता है। परिवारों में समृद्धि लाने वाली स्वस्थ फसल के लिए देवताओं से प्रार्थना करने के साथ-साथ लोग अलाव में मूंगफली, गुड़ की रेवड़ी और मखाना भी चढ़ाते हैं, और फिर लोकप्रिय लोकगीत गाते हुए अलाव के चारों ओर नृत्य करते हैं। यह अग्नि देवता को प्रसन्न करने का कार्य है।

भारत में अधिकांश त्यौहारों के विपरीत, जहां लोग परिवार और दोस्तों के घर जाते हैं और मिठाइयां आदि बांटते हैं, लोहड़ी उत्सव लोगों द्वारा एक आम जगह पर इकट्ठा होने और एक साथ खाने के लिए विभिन्न प्रकार के मीठे व्यंजनों के साथ एक विशाल अलाव स्थापित करने के रूप में चिह्नित किया जाता है। जब लोग ढोल की थाप पर नाचते है, भांगड़ा और गिद्दा करते है तो माहौल पूरी तरह से आनंदमय हो जाता है।

लोहड़ी माता की कहानी

मान्यता है कि दक्ष प्रजापति की पुत्री माता सती की याद में लोहड़ी की आग जलाई जाती है। दक्ष प्रजापति की पुत्री माता सती कोई और नहीं बल्कि भगवान शिव की पत्नी पार्वती थीं।

माना जाता है कि दक्ष प्रजापति ने अपने यहां एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें दक्ष प्रजापति ने शंकर जी को आमंत्रित नहीं किया क्योंकि दक्ष प्रजापति शंकर जी से घृणा करते थे। माता सती इस अपमान को सहन नहीं कर सकीं और यज्ञ की अग्नि में अपनी आहुति दे दी, तब से हर साल माता सती की याद में लोहड़ी मनाई जाती है। लोहड़ी हर साल जनवरी के महीने में मकर संक्रांति से पहले मनाई जाती है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार लोहड़ी दुल्ला भट्टी से जुड़ी हुई है। लोहड़ी के दिन गाए जाने वाले सभी गीतों में दुल्ला भट्टी का जिक्र जरूर होता है।

दुल्ला भट्टी पंजाब क्षेत्र का एक स्थानीय नायक था और मुगल सम्राट अकबर के शासन काल के दौरान,  लोगों के उद्धारकर्ता के रूप में काम करता था और उसे  ‘रॉबिनहुड’  माना जाता था। दुल्ला भट्टी के पूर्वज भट्टी राजपूत कहलाते थे। पंजाब में वह गरीबों की मदद करने के लिए अमीरों के यहां से चोरी करने लगा। उस समय लड़कियों को अमीर लोगों के बीच गुलामी के लिए बेच दिया जाता था। उन्होंने युवा लड़कियों के एक समूह को गुलामी में बेचे जाने से बचाया। दुल्ला भट्टी ने न सिर्फ उन लड़कियों को बचाया बल्कि उनकी शादी भी करा दी।

वह गाँव के लड़कों से लड़कियों की शादी करवाता और उन्हें चोरी की लूट से दहेज देता था। इन लड़कियों में सुंदरी और मुंदरी भी शामिल थीं, जो पंजाब की लोककथा सुंदरी मुंदरी से जुड़ी हुई मानी जाती हैं।

ये किंवदंती पंजाबी लोककथाओं में गहराई से शामिल हैं। लोहड़ी पर ‘दुल्ला भट्टी’ मनाया जाता है और उसके सम्मान में विभिन्न गीत और नृत्य किए जाते हैं।

वहीं दूसरी ओर एक अन्य हिंदू मान्यता के अनुसार लोहड़ी के दिन कंस ने लोहिता नाम की एक राक्षसी को भगवान कृष्ण को मारने के लिए गोकुल भेजा था, जिसे भगवान कृष्ण ने खेलते समय मार डाला था, इसीलिए लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है।

अधिकतर पूछे जाने वाले सवाल

लोग लोहड़ी क्यों मनाते हैं?

पंजाब में लोग सर्दियों के मौसम को समाप्त करने और फसल के मौसम के आगमन का स्वागत करने के लिए लोहड़ी मनाते हैं। त्यौहार नई शुरुआत को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है।

लोहड़ी के दौरान मुख्य अनुष्ठान क्या हैं?

लोग नए कपड़े पहनते हैं और शाम को एक छोटी सी प्रार्थना के लिए अलाव के चारों ओर इकट्ठा होते हैं। बाद में, वे गाते और नाचते हैं और साथ ही अलाव पर मूंगफली, मक्का आदि लोहड़ी माता को चढ़ाते हैं । वे अपने साथ खाने के लिए तरह-तरह के व्यंजन और मिठाइयाँ लेकर आते हैं और परिवार के साथ उपहारों का आदान-प्रदान भी करते हैं।

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