लाल बाग पैलेस | Laal Bhag Palace, Indore

लाल बाग पैलेस मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में स्थित है। यह पैलेस होलकर राजवंश का प्राथमिक निवास स्थान हुआ करता था। होलकर शासकों की गणना भारत के कुछ शक्तिशाली मराठा शासकों में की जाती है।

यह पैलेस शहर से थोड़ा दूर खान नदी के तट पर स्थित है।

सिक्कों का संग्रहालय

इस तीन मंजिला पैलेस की पहली मंजिल पर मुस्लिम ज़माने के पुराने सिक्कों का एक संग्रहालय है। आगंतुकों को इस संग्रह के माध्यम से इंदौर के अतीत में झांकने का मौका मिलता है।

आखिर क्यों पड़ा इस पैलेस का नाम लालबाग ?

1936 से 1938 के शासनकाल में इस महल के बगीचों में लगभग 1600 प्रजातियों के गुलाब लगाए गए थे।

जिनमें से अधिकतर लाल गुलाब थे। उस समय में यह भारत के सबसे अच्छे लाल गुलाबो का बगीचा हुआ करता था इसलिए इसका नाम लालबाग पड़ गया।

इसकी वास्तुकला में है हर देश कि छाप

72 एकड़ में फैले हुए इस पैलेस का निर्माण इंजीनियर कैरी के अंतर्गत हुआ था। इस पैलेस के निर्माण में रोमन शैली का प्रयोग हुआ है। शीशों पर बेल्जियम देश की कलाकृति है। साज सजावट की प्रेरणा पैरिस के राज महलों से ली गई है। कालीन पर्शियन है। पूरे फर्श को बनाने में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। चित्र और मूर्तियों की प्रेरणा इटली से ली गई है। इंजीनियर कैरी ने “इतालवी पुनर्जागरण पुनरुद्धार शैली” का मुख्य रूप से प्रयोग किया है। परंतु इन सब के बावजूद इस पैलेस का मुख्य आकर्षण तो इसका मुख्य द्वार ही है। यह द्वार इंग्लैंड के “बकिंघम पैलेस” के मुख्य द्वार से मेल खाता है।

यह द्वार इंग्लैंड से ही बनकर इंदौर तक आया था। यही कारण है कि आज तक एक बार भी इस द्वार की मरम्मत नहीं हुई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसकी मरम्मत सिर्फ और सिर्फ इंग्लैंड में ही हो सकती है। इस पैलेस की लैंडस्कैपिंग भी काफी आकर्षक है क्योंकि मशहूर उद्यान शास्त्री “हार्वे” ने इसे अपने निर्देश में बनवाया था। 1911 में जब इस पैलेस को यूरोपीय टच अप दिया गया तो मानो इसकी सुंदरता कई गुना और बढ़ गई।

यही इस पैलेस की खासियत है, हर देश की वास्तुकला और कलाकृति को अपने अंदर बसा कर यह सबसे अनोखा बन गया है। इस महल के अंदर कुछ खुफिया सुरंगे भी मिली हैं। एक सुरंग तो रसोई से भी निकलती है।

यह महल 4 स्टफड बाघों का भी घर है, जिन्हें महाराजाओं ने मार डाला था।

इस पैलेस से जुड़ा इतिहास

यह पैलेस होलकर राजवंश की धरोहर है। इसका निर्माण 1886 में तुकोजीराव होलकर द्वितीय ने शुरू करवाया था जो कि अगले 40 सालों तक चलता ही रहा। तुकोजीराव होलकर तृतीय के राज में इसका निर्माण पूर्ण हुआ।

कुछ शाही राजघराने के महत्वपूर्ण लोगों की बैठक और समारोह आयोजित कराने के लिए एक विशाल महल की आवश्यकता थी। यही मुख्य कारण था इसका निर्माण करवाने के लिए। पूरा होलकर राजवंश हमेशा यही निवास किया करता था। तुकोजीराव होलकर तृतीय को यह महल बहुत प्रिय था इसीलिए राजगद्दी त्यागने के पश्चात भी वह यहीं रहा करते थे। अपनी मृत्यु तक वह यहीं रहे। परंतु उनकी मृत्यु के बाद इस महल को किसी ने भी अच्छी तरीके से नहीं संभाला।

सिर्फ उनकी तीसरी पत्नी (नैन्सी मिलर ) ही बची थी, जो कि अमेरिकन थी इसीलिए वह यहाँ से चली गई और यह पैलेस खाली हो गया। देख-रेख ना मिलने के कारण यहां की दीवारें और फर्नीचर धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे थे। महल की प्राचीन चीजों की चोरी तो जैसे आम बात हो गई हो। एक दो बार तो इस पैलेस में आग भी लग चुकी है।

1987 में जाकर राज्य सरकार ने इसे अपनी जिम्मेदारी समझ कर 64 लाख में खरीद लिया। 1988 में  मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने इस पैलेस का नेहरू सेंटर के नाम से उद्घाटन किया। अब इस पैलेस को “विज्ञान प्रौद्योगिकी और कला संग्रहालय” में परिवर्तित कर दिया गया है।

2011 में “मध्यप्रदेश सांस्कृतिक विरासत परियोजना समिति” ने इस महल की सुंदरता को संरक्षित करने के लिए इस पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। इस महल के लिए WMF (विश्व स्मारक कोष) द्वारा धन जुटाया गया था। स्मार्ट सिटी योजना के अंतर्गत इस पैलेस पर १९ करोड़ रुपए खर्च करने का दावा है। वास्तुकार आभा नारायण लांबा को इस काम का जिम्मा सौंपा गया है।

इस महल में जाने का समय

यह पैलेस सिर्फ सोमवार को बंद रहता है। मंगलवार से लेकर रविवार तक यह सुबह 10:00 बजे से लेकर शाम के 5:00 बजे तक खुला रहता है। अंदर जाने के लिए पर्यटकों को सिर्फ ₹20 का टिकट लेना होता है। गाड़ियों के लिए पार्किंग सुविधा भी उपलब्ध है।  इस पैलेस के अंदर फोटो लेना सख्त मना है। हालांकि इस पैलेस का हर हिस्सा पर्यटकों के देखने के लिए खुला नहीं है, क्योंकि कुछ हिस्सों में अभी भी मरम्मत का काम चल रहा है। तीन मंजिलों में से सिर्फ दो मंजिले ही पर्यटन के लिए खुली रखी है।

यह महल आपको  एहसास दिलाएगा कि उस समय के राजा और रानी कैसे रहते होंगे। राजाओं के बड़े ड्रेसिंग रूम और विशाल डाइनिंग हॉल देख कर आपको भी राजाओं जैसा महसूस होगा।

मुख्य द्वार और पैलेस के बीच में थोड़ी ज्यादा दूरी है। बीच में थोड़ा घना जंगल भी आता है । शौचालय की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। अगर आप इंदौर जा रहे हैं तो इस अनोखे महल को देखना ना भूलें।

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