कार्तिक स्नान | Kartik Snan- महत्व, कहानी

कार्तिक पूर्णिमा हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है जो कार्तिक के पवित्र महीने में पूर्णिमा तिथि पर किया जाता है। इस महीने को बहुत शुभ माना जाता है क्योंकि इस पवित्र माह में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और भक्त गंगा नदी में स्नान करते हैं।

कार्तिक स्नान का महत्व

हिंदू धर्म में कार्तिक स्नान का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस एक महीने में विधिपूर्वक स्नान, ध्यान, दान और व्रत करने से करोड़ों जन्मों के पापों का नाश होता है। इस कार्तिक स्नान से जुड़ी कुछ कथाएं भी हैं, जिनमें कृमि और घुन की कथा बहुत प्रसिद्ध है।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि कार्तिक के महीने के दौरान, भगवान विष्णु वेदों को पुनर्स्थापित करने के लिए ‘मतस्य अवतार’ (मछली रूप) में प्रकट हुए थे। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था इसलिए इस दिन को त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा का अत्यधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है और इस बार पूर्णिमा कार्तिक माह के दौरान शुक्ल पक्ष को मनाई जाने वाली है और कार्तिक माह विशुद्ध रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को सबसे पवित्र पूर्णिमाओं में से एक माना जाता है

कार्तिक पूर्णिमा : तिथि, समय, अनुष्ठान और महत्व

कार्तिक स्नान का महत्व हमारे कई हिंदू शास्त्रों और पुराणों जैसे पद्म पुराण, स्कंद पुराण और नारद पुराण में पहले से ही वर्णित है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र स्नान करने के लिए गंगा नदी में गंगा घाट पर जाते हैं।

कार्तिक मास में स्नान करने का फल हजार गंगा स्नान के बराबर होता है। मान्यता है कि कार्तिक मास में स्नान करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। वाराणसी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थस्थल हैं, जहां कार्तिक स्नान के लिए भीड़ रहती है। लोग कार्तिक स्नान के दिन गंगा नदी के पास दीये जलाते हैं जिसे अत्यधिक फलदायी माना जाता है।

भक्त सूर्योदय के समय पवित्र स्नान करने के लिए उठते हैं। कुछ लोग भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इस विशेष दिन पर व्रत भी रखते हैं। लोग ब्राह्मणों को वस्त्र और भोजन दान करते हैं जो अत्यंत शुभ माना जाता है।

हिंदू महीने कार्तिक की पूर्णिमा के दिन को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। इसे सबसे शुभ दिनों में से एक माना जाता है। इसलिए, भक्त गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी, गोमती आदि नदियों के पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा दिवस देव दिवाली समारोह के साथ आता है। ऐसा माना जाता है कि वह दिन था जब भगवान शिव ने त्रिपुरारी का अवतार लिया था। यह वह दिन भी था जब भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार अस्तित्व में आया था। कार्तिक पूर्णिमा व्रत, पूजा विधि और कथा के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़ें।

कार्तिक स्नान एवं पूर्णिमा व्रत नियम

पूर्णिमा के दिन व्रत रखने वालों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  • ब्रह्मचर्य बनाए रखें।
  • जल्दी उठें।
  • जो लोग किसी पवित्र नदी के तट के करीब रहते हैं, वे इसके पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं। पवित्र नदियों में स्नान करके, एक भक्त अपने द्वारा किए गए पापों से खुद को मुक्त कर लेता है। अन्य लोग घर में नहाते समय गंगाजल की कुछ बूंदें मिला सकते हैं।
  • साफ और ताजे कपड़े पहनकर सर्वप्रथम सूर्य देव को जल अर्पित करें और प्रार्थना करें (अर्घ्य करें)।
  • इस दिन मांस, शराब और तंबाकू का सेवन सख्त वर्जित माना जाता है।
  • व्रत के दिन गेहूं, चावल, दाल का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • फलाहार के रूप में फल, दूध आदि व्रत के व्यंजन खाये जाते हैं।
  • पवित्र मंत्रों का जाप करें और भगवान का आशीर्वाद लें।
  • दान कार्यों में भाग लें और दान करें। जरूरतमंदों तक पहुंचें और नकदी या जरूरी चीजों से उनकी मदद करें।

कार्तिक पूर्णिमा की पूजा विधि

  • कार्तिक पूर्णिमा के दिन सत्यनारायण पूजा या भगवान शिव या भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती हैं। हालांकि, पूजा भगवान गणेश की प्रार्थना के साथ शुरू होनी चाहिए।
  • लकड़ी की चौकी पर थोड़ा गंगाजल छिड़कें और इस पर लाल या पीले कपड़ा बिछा दें।
  • भगवान गणेश, भगवान विष्णु, शिव एवं भगवान कार्तिकेय की मूर्ति / छवि रखें। इसके बाद तेल/घी का दीपक जलाएं।
  • भगवान गणेश को जल चढ़ाएं, उसके बाद हल्दी, चंदन कुमकुम, अक्षत, मौली, जनेऊ, उसके बाद गंधम (इत्र) पुष्पम और दूर्वा घास, दीपम (दीपक), धूप और नैवेद्य (भोजन) अर्पित करें।
  • फिर, दो पान के पत्तों, सुपारी, दक्षिणा और फलों से युक्त तंबूलम चढ़ाएं।
  • भगवान गणेश का आशीर्वाद लें, और भगवान विष्णु, भगवान शिव और भगवान कार्तिकेय की पूजा के लिए भी यही प्रक्रिया दोहराएं।
  • हालांकि, दूर्वा घास के बजाय भगवान विष्णु को तुलसी, भगवान शिव को विल्व और भगवान कार्तिकेय को फूल या पंचामृत चढ़ाएं। भगवान शिव को कुमकुम न चढ़ाएं।
  • कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ करें। पूजा अर्चना करने के बाद आरती करें। इस तरह पूजा समाप्त करें।

कार्तिक पूर्णिमा की कथा | कार्तिक पूर्णिमा की कहानी

इस त्योहार से जुड़ी एक किंवदंती के अनुसार, राक्षस तारकासुर के पुत्र – तारकक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली – भगवान कार्तिकेय द्वारा उनके पिता को मारने के बाद देवताओं से बदला लेना चाहते थे। दानव भाइयों की तिकड़ी ने अमरता का वरदान पाने और पूरे ब्रह्मांड पर शासन करने के लिए भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की।

उन्होंने वर्षों तक तपस्या की और भगवान ब्रह्मा का ध्यान जीतने में सफल रहे। हालांकि, चूंकि अमरता ब्रह्मांड के मौलिक नियमों के खिलाफ थी, इसलिए ब्रह्मा ने वरदान देने से इनकार कर दिया। इसलिए तीनों ने ब्रह्मा से ऐसा वरदान मांगा जो उन्हें मृत्यु से बचाए। वरदान के अनुसार, तीनों ने तीन किलों का निर्माण किया- एक स्वर्ग में, एक आकाश में और एक पृथ्वी पर – क्रमशः सोने, चांदी और लोहे के साथ।

वर्ष के दौरान एक बार, सभी तीन किले (सामूहिक रूप से त्रिपुरा के रूप में जाने जाते हैं) संरेखित होंगे, और जो एक ही तीर से तीनों किलों को नष्ट कर देगा, वह उनकी मृत्यु का कारण बन जाएगा। इसके बाद, भगवान शिव त्रिपुरारी के रूप में त्रिपुरा को नष्ट करने और शांति बहाल करने के लिए त्रिपुरासुर को मारने के लिए प्रकट हुए।

कार्तिक स्नान की कहानी

कार्तिक स्नान की कथा में कृमि और घुन की कहानी अत्यंत प्रचलित हैं। कहा जाता हैं कि एक बार कृमि और घुन हुआ करते थे। एक दिन कृमि ने घुन के सामने कार्तिक स्नान करने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन घुन ने कार्तिक स्नान से मना कर दिया। इसके बाद कृमि ने राजा की बेटी के पल्ले से लगकर कार्तिक स्नान किया, लेकिन घुन जीवन में कोई धर्म नहीं कर सका। कुछ समय बाद दोनों की मृत्यु हो गई।

कार्तिक स्नान के प्रभाव से अगले जन्म में कृमि राजा की पुत्री के रूप में पैदा हुई, लेकिन घुन अधर्मी होने की वजह से गधा बन गया। राजा ने बड़े होकर बेटी की शादी करा दी तो ससुराल जाते समय रास्ते में ही उसने अपनी पालकी को रुकवा लिया। जब राजा ने इसका कारण पूछा तो राजकुमारी ने उस गधे को अपने साथ ले जाने की इच्छा व्यक्त की। तब राजा ने कहा यह लेने की बजाय और धन लें लें। लेकिन राजकुमारी ने गधे पर ही जोर दिया और उसे अपने साथ ले गई। जहां उसे राजमहल में सीढ़ियों के पास बांध दिया गया।

अब रानी जब भी राजमहल से नीचे आती थी तो गधे से अपने पिछले जन्म के बारे में बात करती थी। जिसे एक बार उसकी देवरानी ने देख लिया। वह राजा के पास गई और कहा कि तुम्हारी रानी एक गधे से बात करती है और कोई जादू टोना करती है। इस पर राजा भी छिपकर उसे देखता है तो वह गधे से बात करते दिखाई देती है। यह देखकर क्रोध से भरकर वह अपनी तलवार निकाल लेता है और रानी से पूछता है कि बताओ तुम क्या जादू कर रही हो। यह सुनकर रानी अपने और गधे के पिछले जन्म की कहानी सुनाती है और बताती है कि कैसे वह कार्तिक में स्नान करके राजकुमारी बनी।

कार्तिक स्नान का महत्व जानकर राजा ने भी रानी के साथ कार्तिक स्नान करने का निश्चय किया। जिसके बाद कार्तिक में विधिवत स्नान कर राजा का महल धन-धान्य से भर गया। कार्तिक स्नान का जल गधे पर डालने से उसे भी मोक्ष की प्राप्ति हुई।

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