जगन्नाथ रथ यात्रा (पुरी) | Jagannath Rath Yatra, Puri

हिंदु ग्रंथ और पुराणो के अनुसार Jagannath Rath Yatra, Puri को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। इस रथ यात्रा का आयोजन पुरी के जगन्नाथ मंदिर मे प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास मे शुक्ल पक्ष के द्वितीया तिथि को होता है। इस रथोत्सव मे हजारो की तादाद मे श्रद्धालु भाग लेने आते है।

जगन्नाथ रथ यात्रा क्यो निकाली जाती है?

कथनानुसार माता सुभद्रा को अपने मायके द्वारिका से बहुत प्रेम और लगाव था इसलिए उनकी इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा जी ने अलग रथों में बैठकर द्वारिका के भ्रमण को निकले थे। तब से आज तक Puri में हर वर्ष Jagannath Rath Yatra निकाली जाती है।

जगन्नाथ रथ यात्रा की मूर्तियाँ अधूरी क्यो है?

कथनानुसार राजा इन्द्रद्युम्न उड़ीसा के पास रहते थे, को समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। राजा के उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय करते ही वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं प्रस्तुत हो गए। उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूर्णरूपेण बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर श्रीजगन्नाथ जी का मन्दिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए। राजा के परिवारजनों को यह ज्ञात न था कि वह वृद्ध बढ़ई कौन है। कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर  राजा अपनी जिज्ञासा रोक न पाया और जिज्ञासावश महाराजा ने द्वार खोल  दिया पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली।

महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। लेकिन उसी क्षण दोनों ने आकाशवाणी सुनी, ‘व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो।’ आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियाँ पुरुषोत्तम पुरी की रथयात्रा और मन्दिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित है।

जगन्नाथ रथ यात्रा कहाँ से कहाँ तक होती है?

रथ यात्रा का प्रारंभ भगवान जगन्नाथ मंदिर से होता है यहां से भगवान बलराम, श्री जगदीश, और माता सुभद्रा की मूर्तियो को 7 किमी दूर पर स्थित गुंडिचा माता के मंदिर पहुंचाया जाता है। यह यात्रा बहुत ही भव्य होती है

जगन्नाथ रथ यात्रा का रथ कैसा होता है?

रथ यात्रा मे तीनो रथ का निर्माण विशेष रूप से नारियल की लकड़ी से बनाए जाते है।

भगवान जगन्नाथ का रथ अन्य रथोत्सव की अपेक्षाकृत बड़ा होता है। इस रथ को नंदीघोष रथ के नाम से भी जाना जाता है यह रथ सुनहरे पीले और लाल रंग का होता है।ऐसा कहा जाता है कि इस रथ को भगवान इंद्र ने भगवान श्रीकृष्ण को उपहार स्वरूप दिया था।

भगवान बलराम का रथ भगवान जगन्नाथ एवं माता सुभद्रा के रथ से अपेक्षाकृत छोटा होता है। इनके रथ को तलध्वज रथ के नाम से भी जाना जाता है।इनके रथ का रंग नीला और हरा है। भगवान बलराम को नीलांबर भी बोलते है।

माता सुभद्रा का रथ भगवान जगन्नाथ के रथ से छोटा और भगवान बलराम के रथ से बड़ा होता है। इस रथ को देवदलन अथवा दर्प दलन रथ भी कहते है। इनका रथ लाल रंग का होता है।

यह तीनो रथ बहुत ही विशाल और भव्य बनाए जाते है। इन रथो को खींचने एवं देखने हजारो की संख्या मे लोग उपस्थित होते है। भारतवर्ष के कोने कोने से श्रद्धालु आते है और रथ यात्रा मे भाग लेते है।

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व | Importance of Jagannath Rath Yatra, Puri

मान्यता है कि जो व्यक्ति श्री जगन्नाथ जी का दर्शन करते हुए एवं प्रणाम करते हुए मार्ग के धूल-कीचड़ आदि में लोट-लोट हो कर रथ यात्रा मे शामिल होते है व दर्शन करते है वे सीधे भगवान श्री विष्णु के उत्तम धाम को जाते हैं। और जो व्यक्ति गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन करते है। वे लोग दक्षिण दिशा को आते हुए करते हैं वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

Other Articles: सावन के महीने का महत्व | Importance of Sawan – Bholenath Month

Leave a Comment