अनंत चतुर्दशी | Anant Chaturdashi – कथा, महत्व

अनंत चतुर्दशी का हिंदू धर्म में बहुत महत्व माना जाता है। अनंत चतुर्दशी को अनंत चौदस के नाम से भी जाना जाता है। यह पवित्र दिन भगवान विष्णु को समर्पित है जिन्हें ब्रह्मांड के संरक्षक के रूप में जाना जाता है।

Anant Chaturdashi Importance | अनंत चतुर्दशी का महत्व

अनंत चतुर्दशी हिंदुओं और जैनियों द्वारा मनाए जाने वाले शुभ त्यौहारों में से एक है। भगवान विष्णु को अनंत के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है शाश्वत। अनंत चतुर्दशी के दिन, आमतौर पर पुरुष अपने पिछले सभी पापों से मुक्ति पाने के लिए और अपने बच्चों और परिवार की भलाई के लिए अनंत चतुर्दशी का व्रत रखते हैं, लेकिन उम्र और लिंग की परवाह किए बिना कोई भी अनंत चतुर्दशी के इस शुभ दिन पर व्रत रख सकता है। इस दिन भगवान विष्णु अपने भक्तों को स्वास्थ्य, खोई हुई संपत्ति और धन प्रदान करते हैं। भक्तों के लिए कर्मफलों, दुखों और कष्टों से छुटकारा पाने के लिए अनंत व्रत का पालन करना एक अहम् कार्य है। अनंत चतुर्दशी गणेश विसर्जन के भव्य त्यौहार के लिए भी प्रसिद्ध है, लोग इस दिन पूरे समर्पण और भक्ति के साथ दस दिनों तक भगवान गणेश की पूजा करने के बाद उन्हें विदाई देते हैं।

ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने जुए के दौरान अपना सारा वैभव और धन खो दिया और उन्हें 12 वर्षों के लिए वनवास जाना पड़ा। राजा युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से इस समस्या से बाहर निकलने का उपाय सुझाने के लिए कहा, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें अपना खोया राज्य और वैभव पाने के लिए इस विशेष दिन पर उपवास करने और भगवान अनंत की पूजा करने की सलाह दी।

अनंत चतुर्दशी कब मनायी जाती है ?

पंचांग के अनुसार अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि को मनाई जाती हैं।

अनंत चतुर्दशी मनाने का तरीका

जैन धर्म में मनाने का तरीका

जैन कैलेंडर में यह उत्सव अत्यधिक महत्व रखता है। श्वेताम्बर जैन भादो महीने के अंतिम 10 दिनों में अपने पर्व पर्युषण का पालन करते हैं जबकि दिगंबर जैन दसलक्षण पर्व के दस दिनों का पालन करते हैं और चतुर्दशी दसलक्षण पर्व का अंतिम दिन होता है। क्षमावाणी अनंत चतुर्दशी के एक दिन बाद मनाया जाता है, जब जैन समाज के लोग जानबूझकर या अनजाने में की गई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं। यह वह दिन होता है जब भगवान वासुपूज्य, वर्तमान लौकिक चक्र के 12वें तीर्थंकर, ने निर्वाण प्राप्त किया।

हिन्दू धर्म में मनाने का तरीका

नेपाल, बिहार और पूर्वी यूपी के कुछ हिस्सों में, यह त्यौहार क्षीर सागर (दूध का महासागर) और विष्णु के अनंत रूपों से निकटता से जुड़ा हुआ है। इस दिन कुमकुम या सिंदूर के 14 तिलक एक लकड़ी के तख्ते पर बनाए जाते हैं। बनाये गए तिलक पर चौदह पूरियां और चौदह पुए रखे जाते हैं। दूध के महासागर के प्रतीक के रूप में पंचामृत (दूध, दही, गुड़ या चीनी, शहद और घी से बना) युक्त एक कटोरा इस लकड़ी के तख़्त पर रखा जाता है। 14 गांठों वाला एक धागा, जो विष्णु के अनंत रूप का प्रतीक है, एक ककड़ी पर लपेटा जाता है और पंचामृत में पांच बार घुमाया जाता है। बाद में पुरुषों द्वारा इस अनंत धागे को कोहनी के ऊपर दाहिनी भुजा पर बांधा जाता है। महिलाएं इसे बायीं भुजा में बांधती हैं। यह अनंत धागा 14 दिनों के बाद हटा दिया जाता है।

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा

कहा जाता हैं कि प्राचीन समय में सुमंत नाम का एक ब्राह्मण था। उनकी पत्नी दीक्षा से उन्हें सुशीला नाम की एक बेटी हुई। दीक्षा की मृत्यु के बाद, सुमंत ने कर्कशा से विवाह किया, जिसने सुशीला को बहुत कष्ट दिया। सुशीला ने कौंडिन्य से शादी की और उन्होंने सौतेली माँ के उत्पीड़न से बचने के लिए घर छोड़ने का फैसला किया। रास्ते में वे एक नदी के पास रुके। कौण्डिन्य नदी पर स्नान करने चले गए एवं सुशीला उन महिलाओं के समूह में शामिल हो गई जो पूजा कर रही थीं। उन्होंने सुशीला से कहा कि वे “अनंत प्रभु” की पूजा कर रही हैं।

सुशीला ने उनसे इस पूजा के बारे में पूछा, उन्होंने उसे बताया कि यह अनंत भगवान का व्रत हैं। महिलाओं ने भगवान अनंत और उनके व्रत के महत्व के बारे में बताया। सुशीला अपने पति के साथ एक नया जीवन शुरू करने वाली थी, इसलिए उसने सोचा कि समृद्ध भावी जीवन के लिए भगवान अनंत से प्रार्थना करना और आशीर्वाद लेना सबसे अच्छा है। उसने सभी रीति-रिवाजों का पालन किया, व्रत लिया और अपने बाएं हाथ में एक धागा बांधा जिसे पूजा के समय भगवान के सामने रखा जाता है और कलाई में बांधा जाता है।

उस दिन से वह और कौंडिन्य समृद्ध होने लगे और बहुत अमीर हो गए। एक दिन कौंडिन्य ने सुशीला के बाएं हाथ में अनंत की डोरी देखी। जब उन्होंने अनंत व्रत की कहानी सुनी, तो वे अप्रसन्न हो गए और कहा कि वे अनंत भगवान की किसी शक्ति के कारण नहीं, बल्कि अपने स्वयं के प्रयासों से प्राप्त ज्ञान के कारण अमीर बने हैं, इसके बाद उनके बीच बहस हुई। अंत में कौंडिन्य ने सुशीला के हाथ से अनंत डोरी ले ली और उसे आग में फेंक दिया।

इसके बाद उनके जीवन में तरह-तरह की विपत्तियाँ आईं और वे घोर दरिद्रता में डूब गए। कौंडिन्य समझ गया कि यह भगवान अनंत का अपमान करने की सजा थी और उन्होंने फैसला किया कि जब तक भगवान उनके सामने प्रकट नहीं हो जाते, तब तक वह कठोर तपस्या करेंगे। इसके बाद भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए, कौंडिन्य ने उनसे क्षमा माँगी तब भगवान विष्णु ने उन्हें सुख समृद्धि का आशीर्वाद दिया।

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